Saturday, October 8, 2011

इति





बाथरूम के हल्के अंधेरे में।

नल के लगभग चार हाथ नीचे रखी बाल्टी। जब नल का गुणा बीच में हो, पानी मोटे एकरैखिक लकीर की तरह गिरती हुई। आसमानी बाल्टी में पीले रंग का मग। बीचोंबीच उतराता हुआ। मग की कमर पर उपर से गिरती पानी की धार से छिटकता। मँझधार। मंझधार में डोलता हवा से हल्के नाव की तरह जिसकी न कोई पाल है न पतवार। पानी की छिटकन ऐसी मानो लोहे की राॅड में बेल्ट की तरह छेद किए गए हों और उससे पानी इन्द्रधनुष की तरह निकल रहा हो। कभी कभी मग चिहुंक पड़ती है जब पानी उसके पूंछ पर गिरती है। उसके सर में तेज़ सा चक्कर। घिरनी की तरह। पलट का फिर वहीं, कुछ नहीं बदला। बदला तो इस दरम्यान पानी के गिरने का शोर मात्र।

फिर अचानक मग तेज़ पलटती है। आधे भरे मग का मुंह बाथरूम के छत की ओर। शंकर के जटा गंगा पीती हुई। मग का अवसान।                गर्रर्रर्ऱ..............र्रर्र.... प्प। 

एक डुबकी इति। 

चंद बुलबुले शेष। 
                                         हू ू ू ू ू ू ू ू......।


Monday, September 19, 2011

सार


जैसे आग के उस पार की दुनिया थी...।

लहक में गर्म होने के बाद पाक, बरसों पहले गिलावे पर खड़ी की दीवार जो अब हिलती है। जो किसी तरह खड़ा है उसके क्षणिक होने का आभाष लेकिन उसमें लगी मिट्टी हमेशा से अमर...।

खुशकिस्मत हम कि अगर वो बोल सकती तो हमारा एक दुश्मन और होता और जिस रूप में हम उसे सुन रहें हैं वो अपने मूड के हिसाब से सुनते हैं कहां याद रहता है कि गमले में रखी मिट्टी है सबसे अनमोल।

इन दिनों की मिलावट ना हो तो गमला भी आखिरकार मिट्टी ही है और हम भी। मिट्टी आखिरकार मिट्टी ही रही और आखिरकार हम भी हुए नहीं हैं तो हो जाएंगे लेकिन इस बीच क्या हो गए, हो रहे हैं ?

जब जो सुनना था नहीं सुनने पर खुश हुए, होते जा रहे नस्ल।

एक बरगद है, गांव में, ज़हन में। उसकी एक-आध किलोमीटर बाद भी जड़ सतह पर दिखती है। तुम मानो कि वो जड़ की कंघी करती है, मां की गोद में है या फिर अपनी प्रेमिका के जुल्फों की जद में उंगलियां फंसाए बैठा है।


Friday, September 16, 2011

फिंगरप्रिंट



मुख्य सड़क से कोयले खदान तक के बीच की दूरी...

शुष्क सी सड़क है। दरअसल सड़क नहीं रास्ता भर है। उन पर कोयले का बुरादा फैला है। एक भी ट्रैक्टर गुज़रे तो गुबार सा उठता है। हाथ को हाथ नहीं दिखते फिर। बूंदाबांदी शुरू होती है। हर बूंद एक धब्बा बनाता है। धुंआ का एक उठाता है। पूरे रास्ते पर हल्की बूंदाबांदी होने लगती है। यह एकदम शुरूआती चरण है। दूर से देखने पर सड़क पर बिना किसी के चले ही हल्का हल्का कुछ उठने का दृश्य घनीभूत होता है।

कोई आकर कर उन उठते हुए बुरादों की परछाईयों को हाथ में भरने की कोशिश करता है। जब पकड़ में नहीं आने का यकीन होता है तो  अपने को दिलासा देता हुआ हवा में मुठ्ठियां भांजने लगता है। कुछ नहीं आता। हथेली की लकीरों में बस एक गंध बचती सी लगती है।

अंधेरी, काली शाम के साये में एक जोड़ी इंतज़ारी आंखें जो अब उदासी के रंग में रंगकर एक आंखों वाली छाया ही नज़र आती है।



Thursday, September 15, 2011

क्रिस्टल



पूर्णतः श्वेत रौशनी में मगर शरद चांदनी जैसी तो नहीं एक आधी पानी की एक आधी बोतल मेट्रो खुलते, बंद होते दरवाज़े पर अचानक से गिर पड़ती है। बोतल के अंदर हलचल होती है। अंदर का पानी का जड़ता टूटता है और अपने बंद घेरे वाली दीवार में ही अधिकतम फैलाव के साथ पानी की सारी सतहें टूट जाती हैं। प्रत्येक बूंद फिर से प्रस्फुटित होता है। ब्रहमाण्ड से झरती एक अबूझ प्रतिबिंब जब सारी सृष्टि रंग बिरंगी होकर प्रतिबिंबित हो उठती हैं। हर एक बूंद में हज़ारों आईने, विभिन्न कोणों से बोतल के ऊपरी हिस्से पर पड़ता प्रकाश और अंतर जैसे श्वेत बर्फ की पतली, पारदर्शी सिल्ली टूट अपने शरीर पर पड़ते छाया को परावर्तित कर रहे हों। जैसे आकाशगंगा के कई उल्का पिंडो में विस्फोट, रात ढले, ऊंचे लैम्पपोस्ट के पीछे से थमती बारिश की थाह लेने में पलकों पर अति सूक्ष्म झिस्सी का एहसास...!